होता है गाना बजाना दरबार-ऐ-सुलतान
जभी तो कान्हरा बना दरबार की शान
उसकी खुशबू और संगीनता से बना मनहरा
और दुनिया में कहलाया दरबारी कान्हरा
क्योंकी दरबारी में गांधार और धैवत होता है काफी आंदोलित
परिणाम से तानोंका सरजाना बनता है विपरीत
(अड़ाना कान्हरा)
तब तो बना वेगवान राग अड़ाना, जिसका है पेशकश बहुत सुरचित
बिना आंदोलित गांधार और धैवत, राग अड़ाना संभाले गवैयोंका हित
और कभी धैवत भी बने विवादी, तो बने तानबाजी का रास्ता और भी लाजवाबी
(अभोगी कान्हरा)
जब दरबारी में होवे निषाद वर्जित, और कोमल धैवत बने शुद्ध
तब बने अभोगी कान्हरा, वैसी ही सबकी सूज-बुज
(सुहा और सुघराई कान्हरा)
अड़ाना का ही सुरों से बनता है सुहा और सुघराई
कभी कभी दोनों रागोंको मिलाके बनता है सुहा सुघराई
भीमपलास का अंग से चलता है सुहा ‘नी – सा – ग – म – प’
और कान्हरा अंग से है सुघराई में ‘सा – रे – ग – (म) – प’
जो की दोनों रागों के चलन में है मतभेद काफ़ी
पर चलन तो अवरोही का है एक ही सही