बिलावल में लिया ग – रे – म – ग जैसा गौड का अंग,
और बिहाग का प – ग – म – ग जैसा चलन बिलावल के संग
तो बने सरपर्दा बिलावल का रंग
पूर्वांग में जयजयवंती कि छाया
बने कुकुभ बिलावल का साया
रे – ग – म – ग – रे – ग – रे ऐसा लिया पूर्वांग में मोड
तो बने कुकुभ का बिलावल के साथ जोड
उत्तरांग में लिया हमीर, तो बने हमीर बिलावल
हमीर कि छाया से रंग आया अव्वल
यमन में शुद्ध मध्यम का लिया कण, तो बने यमनकल्याण तत्क्षण
और लिया पुरा सुरक्षित मध्यम, तो बने राग यमनी हरदम
यमनी का उत्तरांग में बरता बिलावल, तो बने यमनी बिलावल
जो गौड और जयजयवंती अल्हैया के पूर्वांग में बरते
तो गौड बिलावल और जय जय बिलावल बनकर झलके
शुद्ध बिलावल सरखा है देवगीरी बिलावल
जिसमे पंचम के बदले रखो गांधार पे बल
अंग बिलावल का जिसमे है बहुत कम, वो है शुक्ल बिलावल
गौड मल्हार और खमाज का भास होवे और मध्यम पे बल
तब तो आश्चर्य नहीं है, ये प्रकार क्यों नहीं है प्रचल ।
पं.अरविंद पारिख