बिलावल में लिया ग – रे – म – ग जैसा गौड का अंग, और बिहाग का प – ग – म – ग जैसा चलन बिलावल के संग तो बने सरपर्दा बिलावल का रंग पूर्वांग में जयजयवंती कि छाया बने कुकुभ बिलावल का साया रे – ग – म – ग – रे –… Continue reading Poem7 बिलावल
बिलावल में लिया ग – रे – म – ग जैसा गौड का अंग, और बिहाग का प – ग – म – ग जैसा चलन बिलावल के संग तो बने सरपर्दा बिलावल का रंग पूर्वांग में जयजयवंती कि छाया बने कुकुभ बिलावल का साया रे – ग – म – ग – रे –… Continue reading Poem7 बिलावल
नायकी भी है अड़ाना, सुहा, सुघराई के जूथ में फर्क है आरोही-अवरोही में चलन का प्रयुक्त में जब बागेश्री, काफी, मालकौंस, मालगुंजी और बसंत जोड़ो दरबारी में, तो बने सकीर्ण रंग ये पांच प्रकार इसतरहा से आये समझ सबके संग और भी है प्रकार कान्हरा के, जो बने है अपनी अपनी समझ से कहना मेरा… Continue reading Poem6 गुंजी कान्हरा, हुस्सैनी कान्हरा, मुद्रिकी कान्हरा, बसंती कान्हरा, लाचारी कान्हरा, लंकेश्री कान्हरा
होता है गाना बजाना दरबार-ऐ-सुलतान जभी तो कान्हरा बना दरबार की शान उसकी खुशबू और संगीनता से बना मनहरा और दुनिया में कहलाया दरबारी कान्हरा क्योंकी दरबारी में गांधार और धैवत होता है काफी आंदोलित परिणाम से तानोंका सरजाना बनता है विपरीत (अड़ाना कान्हरा) तब तो बना वेगवान राग अड़ाना, जिसका है पेशकश बहुत सुरचित… Continue reading Poem5 कान्हरा
आदि राग भैरव – संधिप्रकाश स्वरुप भाव धीर गंभीर, मन भावे खूब प्रकार अनेक, दस जिसमे है प्रचल तीन है बहुत प्रचार में, सीधा है जिनकाचलन भैरव, अहीर भैरव और बैरागी भैरव ये सबके लिए है आसान ज़ाहिर है कविता में दिया है सम्मान (भैरव में) करो नी वर्जित, बने बंगाल भैरव करो ग वर्जित,… Continue reading Poem3 भैरव
ये राग मल्हार क्यूँ कहलाया मल का हार (नाश) करे ऐसे समझाया खंड चार प्रकार दस और भी मल्हार है लेकिन इतने बस (lesser known prakars : Charju ki Malhar, Pat Malhar, Bilawal Malhar, Chhaya Malhar) सूरदासी, मेघ और धूलिया मल्हार वो है खंड एक में बिना गांधार सूरदासी, मेघ तो सब समझे धूलिया में… Continue reading Poem2 मल्हार
टोड़ी के है प्रकार पंदर, खंड है दो जिसके अंदर मध्यम तीव्र और मध्यम वर्जित ऐसे है दो खंड सही सर्जित मियाँ की, गुजरी, बहादुरी और खट टोड़ी सबमे तीव्र मध्यम है जब जोडी बिना तीव्र मध्यम के खंड में, जौनपुरी है जमीन छे टोड़ी प्रकार बनते है उसबिन करो कोमल रिषभ, बने कोमल आसावरी… Continue reading Poem1 टोड़ी